Tuesday, June 26, 2012

तराई मे आतंक का तांडव : राष्ट्रीय सहारा / 8 अगस्त 1992


Sunday, January 23, 2011

बत्तीस साल पहले विद्रोही

जो लोग विद्रोही जी को केवल एक कवी के रूप में जानते हैं मैं उन्हें विद्रोही की एक दूसरी झलक दिखाना चाहता हूँ ...जब वे एक क्रन्तिकारी छात्र नेता के रूप में सक्रीय थे / आज से ठीक ३२ साल पहले की बात है/ २३जनवरी को नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का जन्मदिन था वर्ष १९७९ ...../मैं kni सुल्तानपुर में BA का छात्र था और विद्रोही जी LLB के छात्र थे .../उसी रोज सुबह -सुबह कालेज में छात्र आन्दोलन भड़क उठा ... मैंने नेतृत्व अपने हाथ में संभाला ...ल्ल्ब के छात्रों ने एक जुट होकर मेरा साथ दिया ...कालेज में बालबा हो हो गया और छात्र बेलफेयर के इंचार्ज बरिष्ठ प्राध्यापक श्री शुक्ल की छात्रों ने पिटाई कर दी .../

बारह बजे कचेहरी के सामने सुल्तानपुर नगर पालिका में हमारी पार्टी CPIM की तरफ से महगाई और बेरोजगारी तथा सबको सामान सिक्षा का अवसर दिए जाने को लेकर एक धरना था .../ मैं SFI का जिला संजोजक और पार्टी की सिटी ब्रांच का सचिव था लिहाजा मुझे भाषण भी देना था और उसके थोड़ी देर बाद वनारस के लिए रवाना होना था साथ में विद्रोही जी को लेकर / उस समय तक विद्रोही पार्टी के उम्मीदवार सदस्य और पार्टी के सभी फ्रंट पर काम किया करते थे ....विद्रोही बहुत उम्दा भाषण भी करते थे और कवितायेँ तो वे बहुत जोशीले अंदाज़ में सुनाया करते थे ...जब उनकी कविता चल रही होती थी तब सड़कों पर चलने वाले लोग ठहर कर तब तक सनते जबतक विद्रोही की कविता ख़त्म न हो जाय/

२४ जनवरी को वनारस के बेनिया वाले बाग़ में किसान सभा का राष्ट्रीय सम्मलेन था / उस सम्मलेन के लिए विद्रोही और मुझे वालेंटियर बनाया गया था...सभा वगैरह ख़तम करके जल्दी-जल्दी हम दोनों रेलवे स्टेसन पहुंचे ....sfi के बहुत सरे सदस्य हम दोनों को स्टेसन पर छोड़ने आये थे / विद्रोही जी मैं बहुत खुश थे पहली बार सुल्तानपुर से बाहर और राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी मिली थी .....गाड़ी का इंतज़ार कर रहे थे तभी कुछ लड़के हमारे पास आए...और धीरे से मुझसे कहा की शायद आप को कालेज से निष्काषित कर दिया गया है ...हम लोग अभी सीधा कालेज से ही आ रहे हैं वहां पर यह चर्चा बहुत जोरों पर है / मैंने कहा कोई बात नहीं जो होगा देखा जायेगा अब तो वनारस से लौट कर ही इस बारे में सोचा जायेगा /

तभी ट्रेन आयी और हम दोनों उसमे जाकर बैठ गए /मैंने अपने निकले जाने की खबर विद्रोही को नहीं दी इसलिए भी की वह खबर झूठी भी हो सकती थी / बहरहाल हम लोग वनारस में पहुंचकर ..क्या भूमिका निभानी है उसको लेकर बहुत उत्सुक थे ...सबसे पहले हमें दशाश्मेश घाट पार्टी कार्यालय पहुंचकर अपनी पार्टी के लोकसभा सदस्य कामरेड सत्य नारायण सिंह से मिलकर अपनी जिम्मेदारी लेनी थी / रात हो चुकी थी जब हम लोग वनारस पहुंचे ...कामरेड सत्य नारायण ने कहा अभी तो जाकर पोस्टर लगाइए फिर चार बजे भोर में बतओंगा की आप लोगों को कल से क्या करना है / मैंने निकलते-निकलते कामरेड से कहा की हम दोनों को केरल के कामरेडों के डेलिगेट्स के साथ कर दीजियेगा ///कहते हुए पोस्टर लगाने निकल पड़े /

रात भर पोस्टर लगाकर उस सर्द रात में सुबह होने के करीब था तब हम पार्टी कार्यालय पहुंचे तो कहा गया की हमें केरल वाले कामरेडों की सेवा के लिए वालेंटियर बनाया गया है / हम लोग उस धर्मशाले के लिए रिक्शे से रवाना हो गए ..../ धरम्शाले तक पहुंचे ही थे की एक साथी ने बताया केरल वाली ट्रेन स्टेसन पहुँच चुकी है ...बहार खड़े होकर इंतज़ार करने लगे तब तक डेलिगेट्स आना शुरू हो गए ....डेलिगेट्स की सेवा में मैं और विद्रोही समझिये एक पाँव पर खड़े रहे ...रात गुजर गई एक मिनट के लिए सोने को नहीं मिला /

सम्मलेन का पहला सत्र जब दो बजे के करीब ख़तम हुआ तो मुझे और विद्रोही को भी बेनियावाला बाग़ यानी सम्मलेन स्थल पर खाने के लिए और अगले सत्तर को थोड़ी देर तक देखने के लिए बुलवाया गया / जैसे ही मैं वहां पहुंचा कामरेड प्रताप कुमार टंडन ने मुझे आवाज दिया ...वहीँ पर कामरेड शंकर दयाल तिवारी भी खड़े थे मैंने लाल सलाम किया और बातें करने लगा तभी वहां पर मेरे बड़े भाई कामरेड स्टालिन एडवोकेट मेरे पास पहुंचकर धीरे से बोले KNI से तुम्हारे लिए ये टेलीग्राम आया है / मैंने टेलीग्राम को खोलकर पढ़ा तो तो वह मेरा इक्स्पल्सन लेटर था बहरहाल मेरे ऊपर कोई असर नहीं पड़ा .मैं कामरेड विद्रोही को ढूँढने लगा ..वह खाना खा रहे थे ...मैंने भी खाना खाया और एक घंटे तक सम्मलेन को देखा मेरे गाँव के जो लोग वहां आये थे उन्हें भी खाना खिलाया और फिर हम और विद्रोही वापस अपनी डिउटी पर धर्मशाला चले गए /

धर्मशाला तो बिलकुल खलीता सब सम्मलेन में थे हम लोगों ने सोचा थोडा सो लेते हैं ...लेकिन मुझसे रहा नहीं गया मैंने विद्रोही जी को वह टेलीग्राम दिखा दिया ...विद्रोही ने कहा हम लोग क्रन्तिकारी हैं हमें डिग्री की परवाह नहीं हमें तो पूरी सत्ता चाहिए कहने लगे कामरेड घबराने की कोई बात नहीं है एक क्रन्तिकारी व्यक्ति के जीवन में यह बहुत छोटी घटना है ...सुल्तानपुर वापस लौटकर मनेजमेंट का दिमाग ठीक कर दिया जायेगा /

.वैसे तो बहुत लम्बी कहानी है जब मेरे रिअद्मिसन के लिए आन्दोलन बहुत तेज हो गया तो KNI के संस्थापक जो मेरे पिता जी के बहुत अछे दोस्त थे उनहोंने मेरे अब्बा से कहा और फिर मुझे भी बुलाकर कहा की अगर तुम यहाँ पड़ोगे तो कालेज नहीं चल सकता ...मेरे अब्बा ने कहा आप लोग आन्दोलन ख़त्म कर दीजिये ....तब तक मार्च का महीना आ गया ...अप्रैल का महीना शुरू होते ही मैंने jnu जाने का निर्णय कर लिया ....

जिस दिन मैं JNU के लिए सुल्तानपुर से निकल रहा था रस्ते में विद्रोही जी का एक छोटा कमरा था ...मैंने सोचा विद्रोही इ से मुलाकात करता चलूँ अब पता नहीं कब वापस आऊंगा / विद्रोही जी ने कहा असरार मैं भी आप के साथ jnu चलूँगा ...मैं विद्रोही जी को मन नहीं कर पाया ...और मेरे पास बहुत ज्यादा पैसे भी नहीं थे उन दिनों दिल्लिका किराया २८.५० (साढ़े अट्ठाईस) रूपया लगता था ...मैंने कहा विद्रोही जी मेरे पास जितना पैसा है वह तो टिकट में ही ख़तम हो जायेगा फिर jnu में क्या खायेंगे कोई रास्ता सुझाइए क्या किया जाय /

विद्रोही ने कहा चलिए बिना टिकट चलते हैं ..जो होगा देखा जायेगा ...और हम लोग गंगा यमुना पर बिना टिकट चढ़ लिए / आखिर घज़ाबाद में में मजिस्ट्रेट चेकिंग हुई और हम दोनों पकडे गए / मैंने टी टी को बहुत समझाया .कहा की हम लोग मजबूरी में बिना टिकट चल दिए हमें माफ़ कर दीजिये ...उसने कहा हम तो माफ़ कर देते लेकिन ये मजिस्ट्रेट चेकिंग है.../ अंततः उसी टी टी ने हमें बचाया / इस तरह हम दोनों JNU पहुंचे और घनश्याम मिश्रा के कमरे में काफी दिनों तक रहे ..फिर मेरा दाखला हो गया ...लेकिन विद्रोही जी का दाखला उस साल नहीं हो पाया ...ऐसे क्रन्तिकारी हैं अपने विद्रोही जी /

Saturday, December 25, 2010

वाम एकता : समय की मांग ; असरार खान

हमारा देश भ्रष्टाचारों की दलदल में इस तरह से धंसा जा रहा है की आम जनता अब इस व्यवस्था का विकल्प ढूँढने पर विवश हो रही है .सच पुछा जय तो अब उसे अगर किसी राजनीतिक पार्टी से कुछ उम्मीद बची है तो वह केवल लेफ्ट पार्टियाँ ही हैं और अगर लेफ्ट पार्टियाँ समय की इस मांग को समय रहते महसूस नहीं कर सकीं तो उनकी बहुत बड़ी भूल साबित होगी ..हालाँकि ख़ुशी की बात यह है की पिछले दिनों जब नेहाहायत सादे और स्वक्च छवि वाले समाजवादी नेता सुरेन्द्र मोहन जी का इंतकाल हुआ और उनको श्रधांजलि देने के लिए देश के नेता और विद्वान वी पी हॉउस के स्पीकर हॉल में इकठ्ठा हुए तो वहां समाजवादियों और लेफ्ट की एकता के बारे में बात उठी और माकपा के सीताराम यचूरी और भाकपा के नेता वर्धन ने इस दिशा में वक्तव्यों के जरिये पहल की लेकिन सवाल पैदा होता है की अगर यह वक्ताव्यीय पहल महज मौके की नजाकत को देखते हुए फार्मेल्टी में हुआ है तो भी इसका महत्त्व कम नहीं है .

हाँ एक बात जरूर है की समाजवादियों में जितना अधिक विखराव हो चूका है और कई बार सत्ता में उनके रहने के बाद जिस तरह उनका पतन हो चूका है उसके अधर पर देखा जय तो उनसे सचमुच कोई बड़ी उम्मीद करना व्यर्थ होगा लेकिन लेफ्ट ने अपने सम्मान और अपने सिद्धांतों की रक्षा किसी हद तक की है इसलिए उम्मीद भी उन्हीं से की जा सकती है साथ ही यह भी उम्मीद की जा सकती है की समाजवादी नेताओं का भले ही पतन हो गया हो लेकिन उसके समर्थकों का पतन नहीं हुआ है जो किसी नए आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं .

लेफ्ट से ज्यादा उम्मीद इसलिए है की उसके समर्थक पूरे देश में हर जगह मिल सकते हैं और देखा गया है की वेकिसी न किसी रूप में किसी न किसी फ्रोंत के जरिये एक्टिव भी हैं चाहे टीचिंग के मैदान में हों या एन जी ओ अथवा लेखन और पत्रकारिता जैसे महत्वपूर्ण फील्ड में हों , फिल्मों में भी इनकी उपस्थिति कम नहीं है मुझे तो कभी कभी ऐस्सा लगता है की सांस्कृतिक मंच और ट्रेड युनिअनों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है बस उन्हें सामान के साथ इकठ्ठा करने की जरूरत है उनके अनुभओं को भी सुनने और देश की जो नै दिशा हो उसपर उनके विचारों को बिना किसी टीका-टिप्पड़ी के एक बार तो सुनना ही पड़ेगा तभी देश में लेफ्ट आन्दोलन को निर्णायक दिशा में मोड़ा जा सकता है /

वाम एकता और सभी कमुनिस्ट पार्टियों के विलय पर भी बीच-बीच में कोशिशें होती रही हैं केंव्की किसी भी लेफ्ट समर्थक अथवा धुर लेफ्टिस्ट को यह बात अच्छी नहीं लगती की मौलिक रूप से तो सभी कमुनिस्ट पार्टियाँ मार्क्सवादी-लेनिनवादी तथा माओ की महान उपलव्धियों से सहमत हैं फिर भी आखिर कौन सी समस्या है जो अपनी-अपनी डफली अपना-अपना राग की नीति पर चलती जा रही हैं / मुझे यह सौभाग्य प्राप्त है की १९९६ में मैंने भाकपा (माले) और माकपा और भाकपा के बड़े नेताओं से कमुनिस्ट एकता के बारे में जनसत्ता अख़बार के जरिये बहस को अंजाम दिया . माकपा के सीताराम यचूरी और माले के कामरेड विनोद मिश्र ने इस बहस में बड़ी गंभीर दिलचस्पी दिखाई /

जो बहस चली थी उसकी कुछ पेपर कटिंग आप लोगों की सेवा में जस का तस पेश कर रहा हूँ /




Tuesday, December 21, 2010

मुस्लिम वोटों की भूखी कांग्रेस- निशाना हिन्दू संगठनों पर

कांग्रेस पार्टी को मुस्लिम वोटों के लिए इतना परेशान पहले कभी नहीं देखा गया ..लोग कह रहे हैं की उसका पेट मुस्लिम वोट जब से उसके हाथ से निकला तब से उसको सत्ता में आने के लिए छोटे-छोटे लोगों से बड़ी-बड़ी कीमत पर समझौते करने पड़ रहे हैं ..इसलिए उसकी रातों की नीद और दिन चैन दोनों खो गया है !बहरहाल यहाँ यह बात ज्यादा गौरतलब है कि अगर कांग्रेस को मुसलमानों का वोट चाहिए तो वह भाजपा और आर एस एस पर आखिर क्यों हमला कर रही है? शायद कांग्रेस ने राजनीती को बहुत ज्यादा आसान समझ लिया है और वह सोच रही है कि उसके भाजपा या हिन्दू संगठनों के खिलाफ बोलने से मुस्लमान उसको अपना सबसे बड़ा हितैसी समझ लेगा और फिर से इनकी गोद में जा बैठेगा .

कांग्रेस कि इस नादानी पर बड़ी हंसी छूटती है ...अगर इस तुक्के में कोई जान होती तो बिहार में कांग्रेस को जरूर कुछ फल मिला होता ....फिर भी बेचारे दिग्विजय सिंह लगे हुए हैं दिन -रात बस एक ही काम पर...दिग्गी राजा के सहायक के तौर पर उन्हें बीच-बीच में राहुल गाँधी और चिदम्बरम भी मदद करते रहते हैं लेकिन फिर भी मुस्लमान अपनी जगह से टस से मस नहीं हो रहा है ...बल्कि और बेडा गर्क होता जा रहा है बिहार में तो लगभग यह पार्टी ख़तम ही हो गई लगती है . .....

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटों के स्वाभाविक दावेदार मुलायम सिंह हैं तो बचे -खुचे वोटों पर बसपा हाथ मार देती रही है . इसको एक संयोग ही कहा जायेगा कि पिछले लोकसभा चुनाव में उत्त्तर प्रदेश से जो २० सीटें कांग्रेस को मिल गयी थीं वह मुलायम सिंह के आत्मघाती फैसले कि वजह से और मायावती कि मनमानी और अहंकारी तरीके से टिकट बंटवारे कि वजह से...लेकिन अब ये दोनों नेता शायद ही वैसी गलती दुबारा करें . कांग्रेसी इस बात से भी बहुत चिंतित हैं कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटों पर ठीक उसी तरह हक जताने वाली पीस पार्टी का उदय हो रहा है जैसे कभी बसपा ने दलितों से कहा था कि अब तुम्हें किसी और पार्टी को वोट देने कि जरूरत नहीं पड़ेगी अब तुम्हारी अपनी पार्टी बन गई है ...

बसपा के संस्थापक कांशीराम १९८५ से लेकर आखिरी साँस तक यही बोलते रहे और बसपा को इसका बहुत बड़ा फायदा मिला..उत्त्तर प्रदेश के कुछ उपचुनाव में पीस पार्टी ने जिस तरह कांग्रेस को पाचवीं पोजीसन में पहुंचा दिया और खुद दुसरे नंबर पर आ रही है उसे देखते हुए तो यही लगता है कि आने वाले दिनों में पीस पार्टी सपा,बसपा किसी से भी सौदेबाज़ी कर सकती है ..हमारा ऐसा ख्याल है कि मुसलमानों को भाजपा का भय दिखाकर अब कोई पार्टी उसका वोट नहीं ले सकती लेकिन कांग्रेस के पास कोई चारा नहीं है इसलिए वह सोचती है बोलते रहो भाजपा और आर एस एस के खिलाफ हो सकता है कि लह ही जाय .

यह बात भी बहुत दिलचस्प है कि विकीलीक्स के जरिये भारत के हिन्दू संगठनों के बारे में राहुल गाँधी का जो विचार प्रचारित किया जा रहा है कि उनहोंने अमेरिकी राजदूत से कहा कि ये लस्करे तोइबा से भी ज्यादा खतरनाक है .कांग्रेस ने सोचा था कि इसपर भी बखेड़ा खड़ा हो जायेगा और मुस्लमान कांग्रेस को अपना आका मन लेगा ..लेकिन पूरे देश में ऐसा कहीं कुछ नहीं दिखा ...बहुत से लोग तो विकीलीक्स को लीक करने के पीछे अमेरिका का ही हाथ मन रहे हैं और यह भी अनुमान लगा रहे हैं कि इसमें भारत कि कांग्रेस पार्टी भी शामिल है...जो भी हो आज-कल देश कि सारी ही जनता क्या मुस्लिम क्या हिन्दू -सिख-इसाई कोई भी कांग्रेस कि बात को सुन ही नहीं रही है बल्कि वह देखने में विश्वास करने के सिधांत पर चल पड़ी है ...

मुसलमानों में एक सुब्गुबाहट जरूर है वह भी इस बात को लेकर कि कांग्रेस खुद आज जब पावर में है तो फिर रंगनाथ मिश्र आयोग कि सिफारिशों पर अमल करते हुए मुसलमानों को १० % आरक्षण केनव नहीं दे देती और सच्चर कमिटी कि सिफारिसों को ईमानदारी से केंव नहीं लागू करती.? ज्ञात रहे कि सच्चर कमिटी और मिश्र आयोग ने मुसलमानों के बारे में यहाँ तक कह दिया है कि इनकी हालत दलितों से भी बदतर है चाहे शिक्षा कि बात हो या आर्थिक पहलू हो ...इसके बाद भी कांग्रेस पार्टी अगर दायें .बाएं देख रही है और अभी तक कोई सकारात्मक कदम मुसलमानों कि तरक्की के लिए नहीं उठाया है तो इसलिए कि कहीं उससे हिन्दू नाराज न हो जाएँ ...और मुस्लिम सबल न हो जाएँ...बड़ा कोफ़्त होता है यह देखकर कि वोट कि राजनीति के लिए राजनीतिक पार्टियाँ कितना नीचे गिर सकती हैं कमाल है ..


-असरार खान -